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Thursday, 8 September 2011

नज़्म




वफ़ा को मैं ज़फा लिखूं,


ज़फा को मैं वफ़ा लिखूं,


सुलगती धुप की किरणों को ,


सावन की घटा लिखूं .


मेरी मजबूरियों को तू जो ,


चमचा नाम देता है ,


बता इस दौर में मै ,


ये न लिखूं तो क्या लिखूं.



...सुनियेगा अगली पंक्ति तबज्जो से



वफादारी निभाने में अदाकारी नहीं करता,


वो अहमक जो गद्दारों से गद्दारी नहीं करता.


वफादारी का ये आलम कि सब कुत्ता समझते हैं,


यही सब सोच कर मै वफादारी नहीं करता .


.

...सुनियेगा अगली पंक्ति ...



किसी कंजूस मौलवी के यहाँ कुछ लोग जब पहुंचे ,


अचानक देख कर लोगों को मौलवी एक दम चौके ..


होठो पर लाया झूठा तबस्सुम और यूँ बोले ,


अजी ! हज़रात कैसे आये हैं , क्या काम है मुझसे ..?


कहा लोगों ने कब्रिस्तान की रक्षा जरुरी है ,



वहां चारो तरफ दीवार का होना जरुरी है ,


खुदा के नाम पर कुछ आप भी तो कीजिये साहब ,


दीवार खड़ा करने के लिए चंदा तो दीजिये साहब ..


चंदा मांगने वालो से मौल्लावी ने ये फ़रमाया ...


वहाँ चारो तरफ दीवार हो जाए जरुरी क्या ?


जो अन्दर है वो किसी सूरत से बाहर नहीं आ सकते.


और जो बाहर है वो जीते जी तो अन्दर नहीं जा सकते .



...हाज़िर है एक और नज़्म ...नज़्म का उल्वान है पडोसी का *मुर्ग* (मुर्ग = Chicken)



एक मौल्लावी ने मुर्ग पकड़ कर पका लिया,


बच्चों के साथ बैठ कर,खुश हो कर खा लिया..


था जिसका मुर्ग ,ढूंढता फिरता था बेक़रार ,


हर घर में जा कर पूछ रहा था वो बार -बार ,


बस बच गया था मौल्लावी साहब का वो घर,


जिस घर पर डाली न थी एक बार भी नज़र ,


लेकिन तलाश-ए-मुर्ग ने लाचार कर दिया,


...पुछा वो मौलवी से क्या देखा है आपने ,


जिस मुर्ग को दारोगा मैं कहता हूँ प्यार से ?


बोले वो मौल्लावी , मै सच-सच बताऊंगा ,


वरना खुदा-ए-पाक को क्या मुह दिखाऊंगा ,


लम्हा-ए-चाँद मेरी छत पर गुजार के ,


आया तो था चला गया वर्दी उतार के .


By~सुनील कुमार तंग .


5 comments:

Anita said...

वाह वाह ! हा..हा..हा... सुभानल्लाह !

आशा said...

बहुत खूबसूरत नज्म और अभिव्यक्ति |
आशा

jyotsana said...

sahi hai.......
umda..

Pushpendra Dwivedi said...

वाह बहुत खूब अति रोचक रचना

Drishti said...

kahi ko likh diya,
suni ka jawab banakar,
ye kaisi nazm hai mere yaar,
khud hi ko chamcha keh diya yaar banakar!