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Tuesday, 25 January 2011

पथिक








भोर हो गयी...
कब सांझ ढल जाये ।
मन न माने , मोहित हो जाये ।
परदे के आड़ से बगुलों को निहारे।
नदी के किनारे , उंगलियों को उठाये ।
भ्रमित सा होकर , अनजाने डगर पर ,
चोटिल पैरों को , बे-मन दौड़ाये ।

क्या करें ? कहाँ जायें ?
किससे मिलें, किसको बुलाये ,
दिल और दिमाग से अपंग बनाये ,
मन न माने , मोहित हो जाये ।

अनजाने राह पर , कंटीले बाग़ में ,
अजनबी , बेसहारा पथिक बनाए ।



~यज्ञ दत्त मिश्र
२:३९ प्रातः २५/१/2011