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Wednesday, 1 December 2010

मीरा के गिरधर




एक बार और बजा दो न प्रभु ,
अपनी ये सुरीली बाँसुरिया ,
जियरा बौराया है आपके प्रेम में,
बैठ कर बिताती हूँ सारी रतियाँ।

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भूख प्यास सब ले गए ओ गिरधर,
प्रेम की बाँसुरिया तो छोड़ जाओ न ,

मटकी उठाई मैंने आपके प्रीत की ,
कभी मेरी मटकी भो फोड़ जाओ

कितना झूमते हो ग्वालन बीच प्रभु,
कभी मेरी बगिया भी कोड़ जाओ न ।

बुन कर रखी हूँ , गुलाब की लड़ियाँ ,
कभी आकर इन्हें भी तोड़ जाओ न ।

तानें मारे लोग , गोहराये कह कर गुजरिया ,
कभी आकर इनकी बातें मरोड़ जाओ न ।

बैठी हूँ आश में ओ श्याम !
घुंघटा चढ़ाये,सिन्धुर सजाये ,
वीणा बजाये , काजल लगाये ,
कभी मूर्ति से बाहर झाँक जाओ न ।

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~यज्ञ दत्त मिश्र
१/१२/२०१० ६:०२ प्रातः