Advertisement (468 x 60px )


Thursday, 11 November 2010

श्रधा के बाँध टूटे





भैया मेरी साइकिल मत ले जाओ ....-- मेरे भाई ने रोते हुए मुझसे कहा॥

कहता क्यूँ नहीं ...परसों ही पापा ने साइकिल खरीदी थी उसके लिए। मेरे पास भी एक थी । लेकिन वो कहते हैं न दुसरे की गर्लफ्रेंड , दुसरे की शर्ट , दुसरे का मकान अपने से ज्यादा सुन्दर लगता है। कुछ ऐसी ही सोच के गुलाम बन गए थे हम उस दिन ।

अबे रोता क्यूँ है संकट मोचन में दर्शन करने जा रहे है , प्रसाद लेकर जल्दी ही वापस आयेंगे -- मैंने उसको प्यार करते हुए समझाया ।


कीचड़ की एक बूंद भी नहीं होनी चाहिए टायर पर , न कहीं दाग लगना चाहिए , नहीं तो हम साइकिल पटक देंगे और पापा से कहेंगे भी की ये अपनी साइकिल नहीं चलाता है -- मेरे से मुह मोड़ कर उसने प्रस्ताव रखा ।

अच्छा बाबा ! कुछ नहीं होगा आपके साइकिल को । एक दम चमकेगी -- मैंने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ।


पिंटू ! कहाँ जा रहे बेटा ? -- मम्मी ने अपने प्यारे शब्दों से मेरी साइकिल रोक दी ।

माँ बस आधे घंटे में आया,मंदिर जा रहा हूँ -- मैंने जवाब दिया ।

प्रसाद चढ़ा देना , और सबके लिए आशीर्वाद मांग लेना - माँ कह कर अन्दर चली गयी ।



माँ मेरी भगवान् पर बहुत विश्वास करती थी । और उनके कहानियों और उनके साथ व्रत-कथा पढ़ कर कुछ भक्त की छाया मेरे दिल में भी समां गयी थी ।

उसी छाया को ओढ़ कर हम अपनी साइकिल लिए बढे जा रहे थे मंदिर की तरफ । भक्त की भावना चूर-चूर हो गई जब बाज़ार की चमकती सड़को पर रेंग रही लडकियों से नज़रे मिली ।


ये सही है...अरे नहीं ये मस्त है.....ना ये भी ....अरे यार क्या लग रही है....कुछ ऐसे चालीसा वाचते हुए हम चले जा रहे थे ।

मंदिर में पहुँच गए ।

======================================================

मंदिर में पार्किंग की दो जगह थी.....

एक जगह थी मुफ्त-सेवा । जहाँ-मन तहां पटकिये साइकिल ..जहाँ मन तहां जूता चप्पल निकालिए...कोई टोकन नहीं , कोई चौकीदार नहीं ।

और दूसरी जहां साइकिल , बाईक , या किसी भी वाहन को खड़े करने पर टोकन लेना पड़ता था ..और फिर वहाँ के चौकीदार उसकी देख भाल करते ॥

टोकन की कीमत २ रुपये थी। २ रुपये तो वाकई अब कुछ भी नहीं है ....कभी-कभी पैंट से फिसल कर बाथरूम में गिर जाता है ..और हम आप उठाते भी नहीं । ये सोच कर की अब गन्दा हो गया सिक्का ।

लेकिन उस समय २ रुपये मेरे लिए बहुत था...क्यूंकि उसमे २ टोफ्फी आ जाती । एक मेरे लिए और एक भाई के लिए ।

इसलिए मैंने अपने मन में प्रार्थना की ॥

हे ! भगवन ...ये चौकीदार भी तो आपके बनाये हुए खिलौने है ..ये साइकिल भी ..ये ज़मीन भी ..ये मंदिर भी ..बिना आपके देखभाल के तो कुछ भी नहीं हो सकता। मै आपके दर्शन के लिए आया हूँ मेरी साइकिल की देखभाल आप करिए। साइकिल के पीछे अपना चप्पल भी खोस दिया...की भगवन जब साइकिल देखेंगे तो चप्पल भी देख लेंगे।


श्रधा के दिए जल रहे थे मन में । भगवान की प्रतिलिपि मन में मंदिर बना दिए थे ।

हाथ जोड़े दुर्ग पार किया..और मंदिर के आगन में खड़े होकर दर्शन किये और प्रसाद चढ़ाया ।


कुछ देर बैठा...हरिकीर्तन के वर्ण कानो में गुज रहे थे...जिसके सम्मोहन से होस-हवास सब गुम हो गया था..पता ही नहीं चला एक घंटे बीत गए ।

डर नहीं था मन में । क्यूंकि साइकिल तो स्वं महावीर जी निहार रहे थे। और साथ में वो टूटा चप्पल भी ।

लेकिन न जाने क्यों भाई का वो साइकिल के प्रति लगाव मन में झोका दे रहा था ।

एक तस्वीर सी भटकने लगी आँखों के सामने ...मै उसे साइकिल सिखा रहा हूँ॥ और मम्मी हंस रही है देख कर ।

मै डर गया ..श्रद्धा के बाँध टूट गए ।

प्रसाद हाथ से गिर गया...मै दौड़ा मंदिर से बाहर ।



और ये क्या ? जहाँ साइकिल खड़ी की थी वहाँ किसी और की साइकिल ?

मेरी कहाँ गयी फिर -- पसीने निकलने लगे सोच कर ।


मैंने एक -एक साइकिल को घुर-घुर कर देखा ...लेकिन मेरे भाई की साइकिल कहीं नहीं दिखी ...

भाईचारे का मोह ने इतना कमज़ोर कर दिया था ..की मन किया कहा से वो साइकिल ला दूं अब ।



बचपना था । उम्र होगी मेरी करीब १४ साल उस समय ।


भैया मैंने यहाँ एक साइकिल खड़ी की थी , ठीक दीवाल से लगा कर आपने देखा कहाँ गयी - उस चौकीदार से पूछा मैंने जिससे महान कुछ देर पहले महावीर जी थे ।

बेटे अगर अन्दर रखे होते तो हम देखते । ज़िम्मेदारी हमारी होती । तब पूछते की साइकिल कहाँ गयी , तो हम उत्तर भी देते - उसने प्यार से मुझसे कहा ।


फिर अचानक याद आया चप्पल भी गायब हो गया है ।

===================================================

अब तो ढाढस के सारे फूल मुरझा गए थे । हमने ठान ली आज एक चप्पल और एक साइकिल चुरा कर घर जायेगे ।

मंदिर में गए ...एक चप्पल पहन कर निकल आये....थोड़ी सी मुस्कान छाई थी चेहरे पर ।
अब ढूढने लगे कौन सी साइकिल खुली है ।

अरे वाह ! एक मिल गयी ।

धीरे से साइकिल निकला और चढ़ कर जाने लगे ।

पीछे से किसी ने मेरा शर्ट खिंचा और मै गिर गया ॥

एक लड़का था ..मेरे से करीब ७ साल बड़ा ।


क्या छोटू शकल से तो भोले लगते हो , पढाई करो जाकर , क्या ये चोरिया करते फिर रहे हो । तुम्हारा चेहरा देख कर हमें दया आ रहा है नहीं तो हम मार कर हड्डी तोड़ देते - उसने कहा ।


ये शब्द ही शूल से चुभे अन्दर । हड्डी टूटने से ज्यादा दर्द महसूस हुवा इन बातो को सुन कर । मंदिर के चौखट पर जो इज्ज़त का फालूदा महावीर जी ने बनाया था...उससे तो मौत भली जान पड़ती थी ।

एक एक कदम भारी हो गया था । चलने का मन नहीं कर रहा था । आते समय जो रंगीन सड़को पर रंगीन लड़किया थी वो अब किचड़ो की चुड़ैल सी दिख रही थी ।

रात के नौ बज़ गए थे । मेरा भाई सो जाता था , लेकिन उस दिन जगा था ये देखने के लिए की कहीं कीचड़ के छीटे तो नहीं पड़े न साइकिल पर ।


पर उसे क्या मालुम की कीचड़ के छीटे सहित साइकिल को संकट मोचन में बलि चढ़ा आये है हम ।


दरवाज़े की घंटी बजायी मैंने ॥ वही बजा ही सकते थे ,साइकिल की घंटी तो मंदिर में बज गयी थी ।

भाई दौड़ता हुआ मेरे पास आया , और मैंने उसे गोद में उठा लिया ॥
उसने मेरे कान में बोला - "साइकिल गुम हो गयी न ?"

मैंने रोते हुए कहा - हाँ !

माँ आई और दो थप्पड़ लगाया । लेकिन साइकिल खोने की चोट पर थप्पड़ जैसे कपास की रुई सा लग रहा था ।


पूरी रात मै सोया नहीं।

बस ये बात सोच के -" जिनकी पूजा दिन में दो बार होती है , जिनके दर्शन करने मै एक किलोमीटर दूर गया , एक घन्टे हरिकीर्तन सुना , वो मेरी एक साइकिल की देखभाल नहीं कर सके । "


भक्त की प्रतिमा की पुडिया बना कर उसी दिन खिड़की से बाहर फेक दिए ।

अगले दिन पापा आये॥

लखनऊ गए हुए थे कुछ काम से , आते ही पुछा - "मिंटू तुम्हारी साइकिल कहाँ है ?"

मेरा भाई बोला - " पापा कल मै मंदिर गया था , मेरे से गुम हो गयी । मुझे पता नहीं था कहाँ साइकिल रखते है ?"

पापा ने कहा -" भैया को साथ ले जाते "?

उसने कहा - "भैया घर पर थे नहीं ।"


वो बात वहीँ ख़त्म हुई । अगर पापा को पता चलता तो मुझे बहुत मारते । लेकिन ये बात तब पता चली जब में क्लास १२ में पहुच गया था।


मेरे मन के कुरुछेत्र में भाईचारा रुपी अभिमन्यु ने , भगवान के सारे पाखंडो ,श्रधाओं के व्यूह को भेद दिया था ।


आज भी मै उस भाईचारे के मंदिर में अपने सर झुकाता हूँ ।


====================================================


कुछ साल पहले मैथ के एक प्रतियोगिता में मेरे भाई ने भाग लिया था । और उसमे पहला इनाम एक साइकिल जीता था। आज भी उस साइकिल को चलाने से मै डरता हूँ।

लेकिन मुझे विश्वास है मुझसे वो साइकिल कभी गुम नहीं होगी , क्यूंकि अब भगवान् की मूर्ति नहीं , भाई का स्नेह उस साइकिल का देखभाल करता है ।



~यज्ञ दत्त मिश्र

११/११/२०१० ४:१८ प्रातः

20 comments:

Lucifer said...

bahut badhiya hai! majaa aa gaya padh kar!!

Jitendra Kumar said...

mast likha hai yaar...

deep cut said...

really nice....

manish said...

waah mere sher-e-yagya dutt..waah..abe hume fakra he teri sahitya ki knwledge pe..abe tum bade bade writers ko challenge kar skte ho mere bhai..really..its vry awesome.. :):):)

akanksha said...

wooooooooow....bahut achha likha hai...maza aa gaya:-)gud selection of phrases...sweet!!!

kumar saurabh said...

ati sundar
bhai wah

Santak Dalai said...

bahut hi badhiya hai. atti sundar.

Kamal Kumar Singh said...

yaggya aksed me to go through this story , i thought , it may be just like that ,

but going through all , realy it is not what i thought , REALLY AWESOME , so sharp writing with good word CAN paint-rat to any heart , YAGGYA U CAN BE A GD WRITER also , so try to be a gd writer rather than being a BAD ENGINEER :D

KUNJ said...

Hi Yagyadutt,
You must be a professional writer. You really describe the event in such a way, that we the readers are feeling that we are Yagyadutt..........All the Best.......

Pratibha said...

must say u have a nice writing skill..
keep it up...

prabhat said...

Really Very Nice....Sach yagy bhai bahut achchha likha hai, tera ye bhai-chare ki story mere dil ko bha gya....

Atma Prakash Tiwari said...

You are so true... aapki sacchai, aapki likhai me dikhti hai.. bahut umda... ek samay to meri aankho me aansu aa gaye... phir control kiyaa... kya karte ho?? itna emotional hona theek nahi... anyways fabulous writing Yagya... it looks like a movie playing in front of us....

Kishu said...

You are a good narrator.. Dialogues are expertly placed.

priyanka said...

very well done.........keep it up!!n all d best dear for ur future.......hath me jadu hai!!

vineet said...

shandaar shandaar, hindi vakayee kaabiletareef hai, acha laga padhkar,tere poem bhi mast hai

डॉ. नूतन - नीति said...

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

ALOKITA said...

very touchy

pravidhi said...

yagya the subject was really good. the incident which u hav chosen is next to reality n dats y readers can relate this incident to them very easily. we all hav done somthing or the other 'like this' or atleast thought of doing it.. besides this i do hav some critical view .. hope u will not mind and try to work on it..

as i said, story was good, duologues were placed properly.. but somewhere, i felt dat u hav written the matter "bol chal ki bhasha me" but i feel ki bolne me hum kuch bhi bol dete hain but likhte samay kafi bato par dhyan dena padta hai.. jaise "papa" ko "pitaji".. papa jaisa koi word exist ni karta kam se kam hindi
english n urdu me.. jaha tak mujhe pata hai..

next mai ye kahungi ki kahi kahi pe punctuation marks use karne chahiye, to give weight to ur sentence..

kahi kahi pe grammatical n spelling mistakes bhi hain unhe sudhare


m sorry i can not appriciate the wrong things .... sahitya ki jyada knowledge to nahi hai meko.. bus as a reader mujhe kuch kami lagi to bata di ... hope u will take this positively...
n will try to work on it
all d bst

u know wat Yagya
manzil tak pahochne ke liye sabse important kya hota hai?????
"to take d initial step"
n m happy dat u hav already taken it :)
go ahead my frnd n u will just rock d world

Nisha sharma said...

waooo....dat was a good story.... keep writing....:)))

PADMSINGH said...

बचपन में छोटे भाई बहनों के साथ व्यतीत किये गए खट्टे मीठे अनुभव पूरे जीवन हमारे साथ चलते हैं, हमारा व्यवहार, संस्कार, और सह अस्तित्व की भावना इन्हीं अनुभवों से पोषित होती है...

आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं.... जारी रखें