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Sunday, 14 November 2010

ममता का अटूट उदाहरण




तबियत ठीक नहीं है क्या अम्मा - घूँघट ढके एक औरत ने पूछा ।

अरे दुल्हिन ! आज हमें अपने बचवा के याद आवत हे - आँखों से झर-झर आँशु बह रहे थे उस औरत के , खटिये पे लेटे हुए उसने जवाब दिया ।

उम्र होगी उस औरत की करीब ८० साल । बुढ़ापे के पलने में झूल रही थी । गाँव वाले उसे अम्मा कहके बुलाते थे ।
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४० साल पहले उसका एक बेटा था । लोग कहते थे मां और बेटे दोनों ने मिल कर गाँव वालो का दिल जीत रखा था । गाँव वाले सुबह दोपहर रात....तीनो पहर मां बेटे को खाना देते थे। बदले में बेटा दूसरो के खेत में काम करता था,और अम्मा घरो में रसोईया , सफाई , और छोटे मोटे काम करती थी । दिन सुख से भरे थे , अम्मा के भी और गाँव वालो के भी । रात में अम्मा कुँए के पास एक छोटी सी खटिये पे लेट जाती थी , और भजन गाती थी । कभी-२ रात में डहर नाप रहे यात्री थक जाते थे , तो अम्मा के खटिये के पास बैठ कर थोड़ी बाते कर लेते थे । अम्मा के बातो से उनकी थकान मिट जाती थी , आशीर्वाद से उत्साह बढ़ जाता था ।

दिन के उजाले हो या रात की अंधियाली , रास्ते पे चलता हर यात्री आशीर्वाद की उत्सुकता से प्रणाम करता था , और अम्मा दिल खोल कर आशीर्वाद बाटती थी ।

कई शहर के लोग , कई गाँव के लोग उस रस्ते पर कदम रखे चलते थे , कुछ चेहरे जाने होते थे,कुछ अनजाने , लेकिन अम्मा के आशीर्वाद के शब्द सबको लुभा देते थे ।

एक दिन अम्मा का लड़का बीमार हो गया॥ गाँव वालो ने एक कसर न छोड़ी उसके दवा कराने में..शहर से बड़े डॉक्टर को बुलवाया..कई दिनों तक दवा चली ..लेकिन ममता को तरसता हुवा छोड़ वो लड़का चल बसा ।

कुछ दिन अम्मा बहुत रोई ।

रोती क्यूँ नहीं , डहर चलते हुए अनजान बेटो से और कोख से जन्मे लड़के के बीच ममता के कई फासले होते हैं ।

अम्मा बूढी हो गयी थी , लोगो ने मना कर दिया की अब आप किसी के घर में बर्तन-बासन नहीं धोएगी । अम्मा के प्रति लोगो का प्यार और बढ़ गया ।

अम्मा के भजन रात को इतनी सुहानी बना देती थी , की मानो चाँद ढोल बजा रहे है , और सितारे नृत्य कर रहे है । भजन के वर्णों को कानों में दबाये गाँव वाले सो जाते थे ।

अम्मा का न अब कोई सगा बेटा था , न सगा घर । एक कुवा और एक ज़र-ज़र खटिया उनका अपना जान पड़ता था। सुबह का उगता सूरज अम्मा से आशीर्वाद लेकर ही , चाँद को जाने की आज्ञा देता था ।

अम्मा ने ममता की ऐसी कालीन बिछा दी थी की , गाँव में जन्मा हर लड़का ,उनकी गोद में खेल कर बड़ा होता था ।
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जाड़े की एक भीषण रात थी ।

कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी , सन-सन ठंडी हवा कानो में चुभ रही थी , चादर को छेद कर बदन में चिपकती शरद को झेलने की शक्ति किसी में न थी । सहनशक्ति ने उस रात गाँव वालो से मुह मोड़ लिया था । आग भी ठण्ड की लपट से ठंडी हो गयी थी । दो-तल्ले मकान के निचे सो रहे लोगो को भी ठण्ड ने झकझोर दिया था । ऐसा लग रहा था जैसे या तो ज़िन्दगी की पहली रात है ,या आखिरी । उस रात अम्मा का भजन किसी के कानो तक नहीं गया । ठण्ड ने अपने शोर-सपाटे से रात को ढक दिया था । कैसे भी लोगो की रात कटी ।
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ओश की चादर को हटाते हटाते सूरज भी थक गया था । भरी दुपहरिया को हलकी निराशा के साथ आसमान में दिखा । ऐसा मद्धिम रोशनी वाला सूरज गाँव वालो ने आज तक नहीं देखा था । मनहूस सी शकल लिए गाँव वाले बढे जा रहे थे अम्मा के कुँए के पास। डहर भी सुनसान थी । ऐसा लग रहा था जैसे किसी में ताकत नहीं चलने की ।


इतने पहर हो गए अम्मा नहीं उठी । क्या बात है ...?

लोग दौड़ना शुरु किये ....सब पहुँचाना चाहते थे...भागम भागा होने लगी गाँव में...

अरे क्या हुवा ? क्या हुवा ? - किसी ने पूछा

अरे अम्मा की तबियत गड़बड़ा गयी .... ! दौड़ता हुवा एक आदमी अनुमान लगा कर जवाब दिया ।

४ साल का बच्चा से लेकर ...अम्मा से छोटे गाँव में सब दौड़ पड़े ।

चारपाई जैसे अम्मा का बोझ संभाले गिरी हुई थी । आँखे बंद , एक फटी चादर में लिपटा देह , चेहरे पर सफ़ेद बालो के झुरमुट ।

अम्मा ने गाँव वालो को अकेला छोड़ दिया। उस रात की ठण्ड ने कमज़ोर बुढ़ापे को और कमज़ोर कर दिया था । उस दिन गाँव के दरवाज़े-दरवाज़े में शोक का ताला लगा था । डहर चलता हर आदमी रुक कर कुवे के पास दो चार-शब्द अम्मा के बारे में बोल कर जाता था ।

ममता के अटूट बंधन से जकड़े गाँव वालो ने अम्मा का क्रिया-कर्म बिताया । और उस कुवे के पास एक छोटा सा मंदिर बनवाया ।

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आज भी उस मंदिर पर दिया जलाने दूर गाँव के लोग मीलों पैदल चल कर आते है । कई लोग अपने बच्चों का पहला जन्मदिन उसी मंदिर में कथा-पाठ करवा कर मानते है ।


मंदिर के पीछे अम्मा की टुटी चारपाई ऐसे ही रखी हुई है । राह चलते लोग आज भी उसी सौहार्द्य से नतमस्तक होकर चारपाई को निहारते है , और अम्मा को याद करते है ।

लोग कहते है मंदिर के घंटो की आवाज़ सुनते ही ....सबको एक बार अम्मा की याद आ जाती है , मन आशीर्वाद के लिए ललायित होकर मंदिर की ओर बढ़ जाता है ।


~ यज्ञ दत्त मिश्र
१४/११/२०१० ४:१९ प्रातः

5 comments:

Anonymous said...

its awesome..n mind blowing..........

nattu said...

misra ji...sahi batayein bht achaa likhe hai...hum bht hee kam yeh blog-wlog padate hai sab nautanki lagata hai...par bht sahi likhe aap..koi toh hai jo hindi mein likha raah hai :)

Pratibha Mishra said...

bahut badhiya.......

Anonymous said...

bahut hi achi rachna (very touchy)

Amrit Jaiswal said...

upanyaskar munsi premchand ki yaad aa gayi!!