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Wednesday, 1 December 2010

मीरा के गिरधर




एक बार और बजा दो न प्रभु ,
अपनी ये सुरीली बाँसुरिया ,
जियरा बौराया है आपके प्रेम में,
बैठ कर बिताती हूँ सारी रतियाँ।

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भूख प्यास सब ले गए ओ गिरधर,
प्रेम की बाँसुरिया तो छोड़ जाओ न ,

मटकी उठाई मैंने आपके प्रीत की ,
कभी मेरी मटकी भो फोड़ जाओ

कितना झूमते हो ग्वालन बीच प्रभु,
कभी मेरी बगिया भी कोड़ जाओ न ।

बुन कर रखी हूँ , गुलाब की लड़ियाँ ,
कभी आकर इन्हें भी तोड़ जाओ न ।

तानें मारे लोग , गोहराये कह कर गुजरिया ,
कभी आकर इनकी बातें मरोड़ जाओ न ।

बैठी हूँ आश में ओ श्याम !
घुंघटा चढ़ाये,सिन्धुर सजाये ,
वीणा बजाये , काजल लगाये ,
कभी मूर्ति से बाहर झाँक जाओ न ।

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~यज्ञ दत्त मिश्र
१/१२/२०१० ६:०२ प्रातः

Sunday, 28 November 2010

मै चलता रहूँगा .







अब न रुकुंगा ,
न डहर भूलूंगा ,
दिल में दहक ले ,
मैं चलता रहूँगा।

मंजिल नजदीक नहीं,
न मंजिल से दूर हूँ,
वक़्त का आभाव है ,
मै चलता रहूँगा।
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अजनबी वो थे ,
अब हम बन कर फिरते हैं ।
लाखों है पीठ पर लदे ,
आशाओं के मोमबत्ती हाथ लिए ,
निराश नहीं करूँगा।
मै चलता रहूँगा
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खग नहीं खगेश हूँ,
व्योम के साम्राज का...
अजेय अवधेश हूँ ,
मानवता में अहिंसा का
बदलता परिवेश हूँ
परिवेश को परिवेश से ,
बदलता रहूँगा


अब रुकुंगा ,
डहर भूलूंगा ,
दिल में दहक ले ,
मैं चलता रहूँगा



~यज्ञ दत्त मिश्र
११/२८/२०१० ५:५४ सायं काल ।

Sunday, 14 November 2010

ममता का अटूट उदाहरण




तबियत ठीक नहीं है क्या अम्मा - घूँघट ढके एक औरत ने पूछा ।

अरे दुल्हिन ! आज हमें अपने बचवा के याद आवत हे - आँखों से झर-झर आँशु बह रहे थे उस औरत के , खटिये पे लेटे हुए उसने जवाब दिया ।

उम्र होगी उस औरत की करीब ८० साल । बुढ़ापे के पलने में झूल रही थी । गाँव वाले उसे अम्मा कहके बुलाते थे ।
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४० साल पहले उसका एक बेटा था । लोग कहते थे मां और बेटे दोनों ने मिल कर गाँव वालो का दिल जीत रखा था । गाँव वाले सुबह दोपहर रात....तीनो पहर मां बेटे को खाना देते थे। बदले में बेटा दूसरो के खेत में काम करता था,और अम्मा घरो में रसोईया , सफाई , और छोटे मोटे काम करती थी । दिन सुख से भरे थे , अम्मा के भी और गाँव वालो के भी । रात में अम्मा कुँए के पास एक छोटी सी खटिये पे लेट जाती थी , और भजन गाती थी । कभी-२ रात में डहर नाप रहे यात्री थक जाते थे , तो अम्मा के खटिये के पास बैठ कर थोड़ी बाते कर लेते थे । अम्मा के बातो से उनकी थकान मिट जाती थी , आशीर्वाद से उत्साह बढ़ जाता था ।

दिन के उजाले हो या रात की अंधियाली , रास्ते पे चलता हर यात्री आशीर्वाद की उत्सुकता से प्रणाम करता था , और अम्मा दिल खोल कर आशीर्वाद बाटती थी ।

कई शहर के लोग , कई गाँव के लोग उस रस्ते पर कदम रखे चलते थे , कुछ चेहरे जाने होते थे,कुछ अनजाने , लेकिन अम्मा के आशीर्वाद के शब्द सबको लुभा देते थे ।

एक दिन अम्मा का लड़का बीमार हो गया॥ गाँव वालो ने एक कसर न छोड़ी उसके दवा कराने में..शहर से बड़े डॉक्टर को बुलवाया..कई दिनों तक दवा चली ..लेकिन ममता को तरसता हुवा छोड़ वो लड़का चल बसा ।

कुछ दिन अम्मा बहुत रोई ।

रोती क्यूँ नहीं , डहर चलते हुए अनजान बेटो से और कोख से जन्मे लड़के के बीच ममता के कई फासले होते हैं ।

अम्मा बूढी हो गयी थी , लोगो ने मना कर दिया की अब आप किसी के घर में बर्तन-बासन नहीं धोएगी । अम्मा के प्रति लोगो का प्यार और बढ़ गया ।

अम्मा के भजन रात को इतनी सुहानी बना देती थी , की मानो चाँद ढोल बजा रहे है , और सितारे नृत्य कर रहे है । भजन के वर्णों को कानों में दबाये गाँव वाले सो जाते थे ।

अम्मा का न अब कोई सगा बेटा था , न सगा घर । एक कुवा और एक ज़र-ज़र खटिया उनका अपना जान पड़ता था। सुबह का उगता सूरज अम्मा से आशीर्वाद लेकर ही , चाँद को जाने की आज्ञा देता था ।

अम्मा ने ममता की ऐसी कालीन बिछा दी थी की , गाँव में जन्मा हर लड़का ,उनकी गोद में खेल कर बड़ा होता था ।
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जाड़े की एक भीषण रात थी ।

कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी , सन-सन ठंडी हवा कानो में चुभ रही थी , चादर को छेद कर बदन में चिपकती शरद को झेलने की शक्ति किसी में न थी । सहनशक्ति ने उस रात गाँव वालो से मुह मोड़ लिया था । आग भी ठण्ड की लपट से ठंडी हो गयी थी । दो-तल्ले मकान के निचे सो रहे लोगो को भी ठण्ड ने झकझोर दिया था । ऐसा लग रहा था जैसे या तो ज़िन्दगी की पहली रात है ,या आखिरी । उस रात अम्मा का भजन किसी के कानो तक नहीं गया । ठण्ड ने अपने शोर-सपाटे से रात को ढक दिया था । कैसे भी लोगो की रात कटी ।
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ओश की चादर को हटाते हटाते सूरज भी थक गया था । भरी दुपहरिया को हलकी निराशा के साथ आसमान में दिखा । ऐसा मद्धिम रोशनी वाला सूरज गाँव वालो ने आज तक नहीं देखा था । मनहूस सी शकल लिए गाँव वाले बढे जा रहे थे अम्मा के कुँए के पास। डहर भी सुनसान थी । ऐसा लग रहा था जैसे किसी में ताकत नहीं चलने की ।


इतने पहर हो गए अम्मा नहीं उठी । क्या बात है ...?

लोग दौड़ना शुरु किये ....सब पहुँचाना चाहते थे...भागम भागा होने लगी गाँव में...

अरे क्या हुवा ? क्या हुवा ? - किसी ने पूछा

अरे अम्मा की तबियत गड़बड़ा गयी .... ! दौड़ता हुवा एक आदमी अनुमान लगा कर जवाब दिया ।

४ साल का बच्चा से लेकर ...अम्मा से छोटे गाँव में सब दौड़ पड़े ।

चारपाई जैसे अम्मा का बोझ संभाले गिरी हुई थी । आँखे बंद , एक फटी चादर में लिपटा देह , चेहरे पर सफ़ेद बालो के झुरमुट ।

अम्मा ने गाँव वालो को अकेला छोड़ दिया। उस रात की ठण्ड ने कमज़ोर बुढ़ापे को और कमज़ोर कर दिया था । उस दिन गाँव के दरवाज़े-दरवाज़े में शोक का ताला लगा था । डहर चलता हर आदमी रुक कर कुवे के पास दो चार-शब्द अम्मा के बारे में बोल कर जाता था ।

ममता के अटूट बंधन से जकड़े गाँव वालो ने अम्मा का क्रिया-कर्म बिताया । और उस कुवे के पास एक छोटा सा मंदिर बनवाया ।

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आज भी उस मंदिर पर दिया जलाने दूर गाँव के लोग मीलों पैदल चल कर आते है । कई लोग अपने बच्चों का पहला जन्मदिन उसी मंदिर में कथा-पाठ करवा कर मानते है ।


मंदिर के पीछे अम्मा की टुटी चारपाई ऐसे ही रखी हुई है । राह चलते लोग आज भी उसी सौहार्द्य से नतमस्तक होकर चारपाई को निहारते है , और अम्मा को याद करते है ।

लोग कहते है मंदिर के घंटो की आवाज़ सुनते ही ....सबको एक बार अम्मा की याद आ जाती है , मन आशीर्वाद के लिए ललायित होकर मंदिर की ओर बढ़ जाता है ।


~ यज्ञ दत्त मिश्र
१४/११/२०१० ४:१९ प्रातः

Thursday, 11 November 2010

श्रधा के बाँध टूटे





भैया मेरी साइकिल मत ले जाओ ....-- मेरे भाई ने रोते हुए मुझसे कहा॥

कहता क्यूँ नहीं ...परसों ही पापा ने साइकिल खरीदी थी उसके लिए। मेरे पास भी एक थी । लेकिन वो कहते हैं न दुसरे की गर्लफ्रेंड , दुसरे की शर्ट , दुसरे का मकान अपने से ज्यादा सुन्दर लगता है। कुछ ऐसी ही सोच के गुलाम बन गए थे हम उस दिन ।

अबे रोता क्यूँ है संकट मोचन में दर्शन करने जा रहे है , प्रसाद लेकर जल्दी ही वापस आयेंगे -- मैंने उसको प्यार करते हुए समझाया ।


कीचड़ की एक बूंद भी नहीं होनी चाहिए टायर पर , न कहीं दाग लगना चाहिए , नहीं तो हम साइकिल पटक देंगे और पापा से कहेंगे भी की ये अपनी साइकिल नहीं चलाता है -- मेरे से मुह मोड़ कर उसने प्रस्ताव रखा ।

अच्छा बाबा ! कुछ नहीं होगा आपके साइकिल को । एक दम चमकेगी -- मैंने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ।


पिंटू ! कहाँ जा रहे बेटा ? -- मम्मी ने अपने प्यारे शब्दों से मेरी साइकिल रोक दी ।

माँ बस आधे घंटे में आया,मंदिर जा रहा हूँ -- मैंने जवाब दिया ।

प्रसाद चढ़ा देना , और सबके लिए आशीर्वाद मांग लेना - माँ कह कर अन्दर चली गयी ।



माँ मेरी भगवान् पर बहुत विश्वास करती थी । और उनके कहानियों और उनके साथ व्रत-कथा पढ़ कर कुछ भक्त की छाया मेरे दिल में भी समां गयी थी ।

उसी छाया को ओढ़ कर हम अपनी साइकिल लिए बढे जा रहे थे मंदिर की तरफ । भक्त की भावना चूर-चूर हो गई जब बाज़ार की चमकती सड़को पर रेंग रही लडकियों से नज़रे मिली ।


ये सही है...अरे नहीं ये मस्त है.....ना ये भी ....अरे यार क्या लग रही है....कुछ ऐसे चालीसा वाचते हुए हम चले जा रहे थे ।

मंदिर में पहुँच गए ।

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मंदिर में पार्किंग की दो जगह थी.....

एक जगह थी मुफ्त-सेवा । जहाँ-मन तहां पटकिये साइकिल ..जहाँ मन तहां जूता चप्पल निकालिए...कोई टोकन नहीं , कोई चौकीदार नहीं ।

और दूसरी जहां साइकिल , बाईक , या किसी भी वाहन को खड़े करने पर टोकन लेना पड़ता था ..और फिर वहाँ के चौकीदार उसकी देख भाल करते ॥

टोकन की कीमत २ रुपये थी। २ रुपये तो वाकई अब कुछ भी नहीं है ....कभी-कभी पैंट से फिसल कर बाथरूम में गिर जाता है ..और हम आप उठाते भी नहीं । ये सोच कर की अब गन्दा हो गया सिक्का ।

लेकिन उस समय २ रुपये मेरे लिए बहुत था...क्यूंकि उसमे २ टोफ्फी आ जाती । एक मेरे लिए और एक भाई के लिए ।

इसलिए मैंने अपने मन में प्रार्थना की ॥

हे ! भगवन ...ये चौकीदार भी तो आपके बनाये हुए खिलौने है ..ये साइकिल भी ..ये ज़मीन भी ..ये मंदिर भी ..बिना आपके देखभाल के तो कुछ भी नहीं हो सकता। मै आपके दर्शन के लिए आया हूँ मेरी साइकिल की देखभाल आप करिए। साइकिल के पीछे अपना चप्पल भी खोस दिया...की भगवन जब साइकिल देखेंगे तो चप्पल भी देख लेंगे।


श्रधा के दिए जल रहे थे मन में । भगवान की प्रतिलिपि मन में मंदिर बना दिए थे ।

हाथ जोड़े दुर्ग पार किया..और मंदिर के आगन में खड़े होकर दर्शन किये और प्रसाद चढ़ाया ।


कुछ देर बैठा...हरिकीर्तन के वर्ण कानो में गुज रहे थे...जिसके सम्मोहन से होस-हवास सब गुम हो गया था..पता ही नहीं चला एक घंटे बीत गए ।

डर नहीं था मन में । क्यूंकि साइकिल तो स्वं महावीर जी निहार रहे थे। और साथ में वो टूटा चप्पल भी ।

लेकिन न जाने क्यों भाई का वो साइकिल के प्रति लगाव मन में झोका दे रहा था ।

एक तस्वीर सी भटकने लगी आँखों के सामने ...मै उसे साइकिल सिखा रहा हूँ॥ और मम्मी हंस रही है देख कर ।

मै डर गया ..श्रद्धा के बाँध टूट गए ।

प्रसाद हाथ से गिर गया...मै दौड़ा मंदिर से बाहर ।



और ये क्या ? जहाँ साइकिल खड़ी की थी वहाँ किसी और की साइकिल ?

मेरी कहाँ गयी फिर -- पसीने निकलने लगे सोच कर ।


मैंने एक -एक साइकिल को घुर-घुर कर देखा ...लेकिन मेरे भाई की साइकिल कहीं नहीं दिखी ...

भाईचारे का मोह ने इतना कमज़ोर कर दिया था ..की मन किया कहा से वो साइकिल ला दूं अब ।



बचपना था । उम्र होगी मेरी करीब १४ साल उस समय ।


भैया मैंने यहाँ एक साइकिल खड़ी की थी , ठीक दीवाल से लगा कर आपने देखा कहाँ गयी - उस चौकीदार से पूछा मैंने जिससे महान कुछ देर पहले महावीर जी थे ।

बेटे अगर अन्दर रखे होते तो हम देखते । ज़िम्मेदारी हमारी होती । तब पूछते की साइकिल कहाँ गयी , तो हम उत्तर भी देते - उसने प्यार से मुझसे कहा ।


फिर अचानक याद आया चप्पल भी गायब हो गया है ।

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अब तो ढाढस के सारे फूल मुरझा गए थे । हमने ठान ली आज एक चप्पल और एक साइकिल चुरा कर घर जायेगे ।

मंदिर में गए ...एक चप्पल पहन कर निकल आये....थोड़ी सी मुस्कान छाई थी चेहरे पर ।
अब ढूढने लगे कौन सी साइकिल खुली है ।

अरे वाह ! एक मिल गयी ।

धीरे से साइकिल निकला और चढ़ कर जाने लगे ।

पीछे से किसी ने मेरा शर्ट खिंचा और मै गिर गया ॥

एक लड़का था ..मेरे से करीब ७ साल बड़ा ।


क्या छोटू शकल से तो भोले लगते हो , पढाई करो जाकर , क्या ये चोरिया करते फिर रहे हो । तुम्हारा चेहरा देख कर हमें दया आ रहा है नहीं तो हम मार कर हड्डी तोड़ देते - उसने कहा ।


ये शब्द ही शूल से चुभे अन्दर । हड्डी टूटने से ज्यादा दर्द महसूस हुवा इन बातो को सुन कर । मंदिर के चौखट पर जो इज्ज़त का फालूदा महावीर जी ने बनाया था...उससे तो मौत भली जान पड़ती थी ।

एक एक कदम भारी हो गया था । चलने का मन नहीं कर रहा था । आते समय जो रंगीन सड़को पर रंगीन लड़किया थी वो अब किचड़ो की चुड़ैल सी दिख रही थी ।

रात के नौ बज़ गए थे । मेरा भाई सो जाता था , लेकिन उस दिन जगा था ये देखने के लिए की कहीं कीचड़ के छीटे तो नहीं पड़े न साइकिल पर ।


पर उसे क्या मालुम की कीचड़ के छीटे सहित साइकिल को संकट मोचन में बलि चढ़ा आये है हम ।


दरवाज़े की घंटी बजायी मैंने ॥ वही बजा ही सकते थे ,साइकिल की घंटी तो मंदिर में बज गयी थी ।

भाई दौड़ता हुआ मेरे पास आया , और मैंने उसे गोद में उठा लिया ॥
उसने मेरे कान में बोला - "साइकिल गुम हो गयी न ?"

मैंने रोते हुए कहा - हाँ !

माँ आई और दो थप्पड़ लगाया । लेकिन साइकिल खोने की चोट पर थप्पड़ जैसे कपास की रुई सा लग रहा था ।


पूरी रात मै सोया नहीं।

बस ये बात सोच के -" जिनकी पूजा दिन में दो बार होती है , जिनके दर्शन करने मै एक किलोमीटर दूर गया , एक घन्टे हरिकीर्तन सुना , वो मेरी एक साइकिल की देखभाल नहीं कर सके । "


भक्त की प्रतिमा की पुडिया बना कर उसी दिन खिड़की से बाहर फेक दिए ।

अगले दिन पापा आये॥

लखनऊ गए हुए थे कुछ काम से , आते ही पुछा - "मिंटू तुम्हारी साइकिल कहाँ है ?"

मेरा भाई बोला - " पापा कल मै मंदिर गया था , मेरे से गुम हो गयी । मुझे पता नहीं था कहाँ साइकिल रखते है ?"

पापा ने कहा -" भैया को साथ ले जाते "?

उसने कहा - "भैया घर पर थे नहीं ।"


वो बात वहीँ ख़त्म हुई । अगर पापा को पता चलता तो मुझे बहुत मारते । लेकिन ये बात तब पता चली जब में क्लास १२ में पहुच गया था।


मेरे मन के कुरुछेत्र में भाईचारा रुपी अभिमन्यु ने , भगवान के सारे पाखंडो ,श्रधाओं के व्यूह को भेद दिया था ।


आज भी मै उस भाईचारे के मंदिर में अपने सर झुकाता हूँ ।


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कुछ साल पहले मैथ के एक प्रतियोगिता में मेरे भाई ने भाग लिया था । और उसमे पहला इनाम एक साइकिल जीता था। आज भी उस साइकिल को चलाने से मै डरता हूँ।

लेकिन मुझे विश्वास है मुझसे वो साइकिल कभी गुम नहीं होगी , क्यूंकि अब भगवान् की मूर्ति नहीं , भाई का स्नेह उस साइकिल का देखभाल करता है ।



~यज्ञ दत्त मिश्र

११/११/२०१० ४:१८ प्रातः